गुजारिश थी मेरी शबनमी मोती बूँदों की बोलती लिखावट कहानी की l
सदियाँ ना लगाना कोरे कागज लिखे मौन अल्फाजों सुनने जुबानी सी ll
निहारना शहद घुली मीठी चासनी सलवटें इस एकांकी वर्णन की ll
पढ़ने जिस खुली अधूरे प्रेम ग्रंथ को बैचैन था वो मेरा चाँद भी कभी ll
बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l
जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll
इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l
खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll
टूटी कलम नोंक लिखती रही आखर टेढ़े मेढ़े डुबो खुद को सरोबार रंगों में l
कतरन उन पुरानी पैबंद लगे किताबों की खोई रही यादों की इस अलमारी में ll
भावपूर्ण सुंदर सृजन
ReplyDeleteआदरणीया अनीता दीदी जी
Deleteसराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के हृदयतल से आभार आपका ।
सुंदर प्रस्तुति
ReplyDeleteआदरणीय ओंकार भाई साब
Deleteसुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद
सुंदर
ReplyDeleteआदरणीय सुशील भाई साब
Deleteसुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद
सुंदर भावपूर्ण सृजन
ReplyDeleteआदरणीया अनीता दीदी जी
Deleteसराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के हृदयतल से आभार आपका ।
सुंदर सृजन!
ReplyDeleteआदरणीया शुभा दीदी जी
Deleteसराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के हृदयतल से आभार आपका ।
वाह !!!
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर ।