Sunday, June 7, 2026

गुजारिश

गुजारिश थी मेरी शबनमी मोती बूँदों की बोलती लिखावट कहानी की l

सदियाँ ना लगाना कोरे कागज लिखे मौन अल्फाजों सुनने जुबानी सी ll


निहारना शहद घुली मीठी चासनी सलवटें इस एकांकी वर्णन की ll

पढ़ने जिस खुली अधूरे प्रेम ग्रंथ को बैचैन था वो मेरा चाँद भी कभी ll


बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l

जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll


इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l

खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll


टूटी कलम नोंक लिखती रही आखर टेढ़े मेढ़े डुबो खुद को सरोबार रंगों में l

कतरन उन पुरानी पैबंद लगे किताबों की खोई रही यादों की इस अलमारी में ll

11 comments:

  1. भावपूर्ण सुंदर सृजन

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    1. आदरणीया अनीता दीदी जी
      सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के हृदयतल से आभार आपका ।

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  2. सुंदर प्रस्तुति

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    1. आदरणीय ओंकार भाई साब
      सुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद

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    1. आदरणीय सुशील भाई साब
      सुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद

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  4. सुंदर भावपूर्ण सृजन

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    1. आदरणीया अनीता दीदी जी
      सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के हृदयतल से आभार आपका ।

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    1. आदरणीया शुभा दीदी जी
      सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के हृदयतल से आभार आपका ।

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  6. वाह !!!
    बहुत ही सुन्दर ।

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