खो गयी परछाईं उस अलख जगाते अर्ध चाँद की l
पतंग मांझे डोरी उलझ चटकी चरखी पायदान की ll
कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l
आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll
स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l
टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll
टूटी निंद्रा केशों वेणी गुँथी मन बावरे नादान की l
फिसली धड़कन लकीरें उस मोक्ष संगम चाह की ll
मिटा गयी तारीख उस गुलाबी सर्द काग़ज़ फूलों साँझ की l
डस गयी जिसे ग्रहण रेखा एक अंतिम आलिंगन पुकार की ll
सुंदर रचना।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आदरणीया स्वेता दीदी जी
Deleteमेरी रचना को अपना मंच प्रदान करने के लिए तहे दिल से आपका आभार
Wahhh ❤️
ReplyDeleteआदरणीय भाई साब
Deleteसुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद