Thursday, July 2, 2026

काग़ज़ फूल

खो गयी परछाईं उस अलख जगाते अर्ध चाँद की l

पतंग मांझे डोरी उलझ चटकी चरखी पायदान की ll


कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l

आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll


स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l

टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll


टूटी निंद्रा केशों वेणी गुँथी मन बावरे नादान की l 

फिसली धड़कन लकीरें उस मोक्ष संगम चाह की ll


मिटा गयी तारीख उस गुलाबी सर्द काग़ज़ फूलों साँझ की l

डस गयी जिसे ग्रहण रेखा एक अंतिम आलिंगन पुकार की ll

4 comments:

  1. सुंदर रचना।
    सादर।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    1. आदरणीया स्वेता दीदी जी
      मेरी रचना को अपना मंच प्रदान करने के लिए तहे दिल से आपका आभार

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  2. Replies
    1. आदरणीय भाई साब
      सुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद

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