तालीम सावन नयी सीखा गयी नीलामी मुनादी सौदागरी को l
रात परछाई बारिश बूँदें बेच आयी रोते खारे आँसू पानी को ll
बादलों अमिट छाप थी उसके अर्ध चाँद हुनरमंद कलाकारी को l
मोल समझ ना पायी जुल्फें इसकी पलकों रिसते खारे पानी को ll
बिन रूह जिस्म को भा गयी तंग गलियाँ इसके आँगन को l
दागों अनगिनत पैबंद कढ़ी इसके एकांकी एकांत साये को ll
किनारा कर आसमाँ आँचल बाँध दिया रोती बारिश यादों तन्हाई को l
टकरा काँच दीवारों से थम गया शोर इसका उफनते बारिश पानी को ll
नजरबंद थी तमाशबीन रोती आँसू आँखें सावन की परछाई को l
चाँद शांत हृदय भीगता रहा ताउम्र अपने ही खुदगर्ज फ़साने को ll
मार्मिक भावाभिव्यक्ति ।
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