Saturday, September 12, 2026

बिडम्बना

टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को I

काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को ll

 

बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को l

मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll

 

बदरंग ना हो फटा आँचल अनचाहे तेजाब खारे पानी को l

अस्तित्व उलझी उलझी मौन घूंघट ओढ़नी नीम झाड़ी को ll

 

पलकों टपकती नूर माँगी दुआएँ सोई आँसुयें बरसातों को l

विरासत लिखी सूखे पानी तरसते कंठ मरुधर आँगन को ll

 

बिलखती व्याकुल पिपासा सूखे आँसू कांटों लिपट रोने को l

मुरझाई कपोलें खोई मरूधरा शीतल रातें मझधार साये को ll


10 comments:

  1. बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को l

    मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll
    बहुत सुन्दर, बेहतरीन सृजन ।

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    1. आदरणीया सुधा दीदी जी
      आशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन

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  2. मार्मिक रचना

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    1. आदरणीया अनीता दीदी जी
      आशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन

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  3. मार्मिक भावाभिव्यक्ति ।

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    1. आदरणीया मीना दीदी जी
      आशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन

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  4. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 7 अक्टूबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. बहुतै सुंदर
    आभार

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  6. गहरी पंक्तियाँ !

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