टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को I
काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को ll
बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को l
मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll
बदरंग ना हो फटा आँचल अनचाहे तेजाब खारे पानी को l
अस्तित्व उलझी उलझी मौन घूंघट ओढ़नी नीम झाड़ी को ll
पलकों टपकती नूर माँगी दुआएँ सोई आँसुयें बरसातों को l
विरासत लिखी सूखे पानी तरसते कंठ मरुधर आँगन को ll
बिलखती व्याकुल पिपासा सूखे आँसू कांटों लिपट रोने को l
मुरझाई कपोलें खोई मरूधरा शीतल रातें मझधार साये को ll
बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को l
ReplyDeleteमृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll
बहुत सुन्दर, बेहतरीन सृजन ।
आदरणीया सुधा दीदी जी
Deleteआशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन
मार्मिक रचना
ReplyDeleteआदरणीया अनीता दीदी जी
Deleteआशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन
मार्मिक भावाभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteआदरणीया मीना दीदी जी
Deleteआशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 7 अक्टूबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बहुतै सुंदर
ReplyDeleteआभार
सुंदर
ReplyDeleteगहरी पंक्तियाँ !
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