Friday, May 6, 2016

गुस्ताखी

माना गुस्ताख थी जिंदगी हमारी

पर शबनम किसीके सहेजना तो गुस्ताखी ना थी

हर कतरा अनमोल था उनकी अश्कों का

क्योंकि उनके हर कतरे में एक पैगाम था

गुस्ताख दिल का करम बस इतना सा था

वो अश्कों में दुनिया भुलाते थे

और हम उसी में जन्नत तलाशते थे

पर परवरदिगारने ने भी रहमत ना बरसाई थी

तोहमत ज़माने ने जब खुदगर्जी की लगाई थी

 जब शराफत में भी हमारी

ज़माने को गुस्ताखी नजर आयी थी




हस्ती

चले थे जो हस्ती हमारी मिटाने

खाब्ब उनके सुपर्दे खाक हो गए

भरी महफ़िल में भी

जिक्र हमारा देख

वो नामवाले गुमनाम हो गए

तलाशने फिर अपनी जमीं

वो तन्हा नादान

बेआबरू हो महफ़िल से रुखसत हो गए


Sunday, April 3, 2016

हारी बाजी

कहानी मेरी भी औरों से जुदा ना थी

शतरंज की बिसात पे जैसे जिंदगी सजी थी

एक अदना सा मोहरा था मैं उस चाल का

लगाम जिसकी थी दिग्गजों के हाथ में 

पर वर्चस्व के इस समर में

कुरुक्षेत्र की रणनीति अभी आनी थी

मगर चूक गयी गर्दन तलवार की धार से

ओर पलट दी बाजी मोहरे ने धीमी चाल से

मात खा गया बादशाह एक सिपहसालार से

छोड़ जीत के जश्न को मध्य मार्ग में

मोहरे ने फिर बैठा दिया बादशाह को तख्तों ताज पे

ओर राज हो गया मोहरे का सबके दिलों दिमाग पे

पर राजनीति के इस द्वन्द में

फिर भी मैं हार गया अपनों के हाथों जीत के

अपनों के हाथों जीत के

Monday, March 21, 2016

मर्ज़

हवा न जाने कौन सी छू गयी

मर्ज़ इश्क़ का हमको दे गयी

खिलते गुलाब सा मुखड़ा

जैसे सौगात में दे गयी

जालिम बदल फ़िर फिजाँ की बयार

रुख से नक़ाब उड़ा ले गयी

ओर जाते जाते , दिल के चमन में

जन्नत बसा गयी

ना आया जिसे कभी इश्क़ करना

उसे इश्क़ की वादियों में तन्हा छोड़ गयी

हवा न जाने कौन सी छू गयी

मर्ज़ इश्क़ का हमको दे गयी

हवा न जाने कौन सी छू गयी

Thursday, March 3, 2016

लफ्ज़

अधरों को मेरे लफ्ज़ अगर मिल जाते

करने हर खाब्ब को सच

पर लगा के वो उड़ जाते

ठहर ना पाती बात इसी तलक

क्योंकि, सितारों की महफ़िल से निकल वो

करीब चाँद के चले आते

आरजू जो थी दिल की

हसरतें वयां करने की

तम्मना पूरी वो कर पाते

तुम मानो  या ना मानो

रुखसत तेरे दिल से फिर कैसे हो पाते

अधरों को मेरे जो लफ्ज़ मिल जाते

अधरों को मेरे जो लफ्ज़ मिल जाते