हल्के हल्के पदचापों की आहटें l
थिरका रही बावरे मन की आयतें ll
दस्तक दे रही उस परिंदे घरोंदों को l
आ ढहा जा इस एकाकी दीवारों को ll
कटे पर बेताब हूँ परवाज़ भर जाने को l
आतुर हूँ छूने अम्बर के उन बादलों को ll
सूख ना जाए पानी कहीं इन बरसातों के l
लिपट अंग भिगों दे आँचल अरमानों के ll
हिज़्र में जिसकी कितनी सदियाँ गुज़र गयी l
मुलाक़ात उस खुदा से एक मुकम्मल हो जाये ll
संग तारुफ़ उनके मिज़ाज़ की शरीक ऐसी रहे l
इत्तेफाकन ही मिल जाये वो इस अंजुमन में ll
आवाज़ दे रही एकाकी पिंजरें की दरों दीवारें l
बसेरा बन बस जाये उनकी यादों के साये ll