साये ने मेरे प्रतिलिपि लिखी थी एक गुमनामी शाम की l
गुलमोहर छाँव परछाई सहमी थी उस किनारे घाट की ll
कशिश सरोबार सिंदूरी श्रृंगार मन वैजयंती ताल की l
सहज लहर पदचापें ठौर उस क्षितिज गुलाबी साँझ की ll
साँझी लेखनी साँसे कोई प्रत्युत्तर अंकित इस राज की l
बहक उलझ गयी थी केशें उस हसीं चित्रण ख्वाब की ll
अंतरंगी डोर वैतरणी रूपरेखा उस खोई पहेली शाम की l
सतरंगी साजों धुन पिरो रही छलकती ओस बूँदों ख़ास की ll
मंथन उस काव्य धरा सजली थी प्रतिलिपि मेरे नाम की l
स्वच्छंद मुक्त हो गयी पिंजर बंद धड़कने मेरे उस चाँद की l