Friday, July 28, 2017

तरीक़े

जीने के तरीक़े तलाश रहा हूँ

शायद अपने आप को संभाल रहा हूँ

ठोकर गहरी इतनी लगी

फिर  उठने की कोशिश कर रहा हूँ

ना ही कोई खुदा हैं

ना ही कोई अपना हैं

जन्म मृत्यु के बीच का फासला ही

यथार्थ में कर्मों का ही रूहानी खेल हैं

आत्मसात हुआ इस ज्ञान का

जिंदगी रूबरू हुई जब अपने आप से

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29-07-2017) को "तरीक़े तलाश रहा हूँ" (चर्चा अंक 2681) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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