Tuesday, August 22, 2017

खबर

ख़ुद में हम यूँ मशगूल रहे

खबर अपनों की भी ना रहीं

साँसे चल रहीं या ठहर गयी

धड़कने भी इससे अंजान रहीं

मुद्दतों बाद एक सकून मिला

ख़ुद से रूबरू हो

गुफ्तगूँ करने का अवसर जो मिला

सोचा परख लूँ

क्योँ ना फ़िर अपने आपको

दो चार दिनों बाद

कभी तो करना होगा सामना

इठलाके आती हुई साँझ से

मुलाक़ात इसलिए भी मुनासिब हैं

एक बार अपने आप से

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (24-08-2017) को "नमन तुम्हें हे सिद्धि विनायक" (चर्चा अंक 2706) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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