Thursday, September 7, 2017

नींद

रात गुजरती नहीं सुबह चली आती हैं

नींद एक अदद फिर मुकम्मल हो पाती नहीं

विपासना साधना में तल्लीन मन

स्वांग आडंबर का रचाती हैं

ना जाने कैसे सपनों की धरोहर हैं ये

अमूल्य नींद के पलों को बेआबरू कर जाती हैं

बचपन में अर्जित नींद की अस्मत को

क्योँ फटेहाल किस्मत तार तार कर जाती हैं

सपनों की सौदागिरी में

शायद नींद भी कहीं बिक जाती हैं

परवान चढ़ते इस समझौते से

बिन थपकी ही रात पहर गुजर जाती हैं

और बिन नींद मुकम्मल हुए

सुबह चली आती हैं

सुबह चली आती हैं

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