क़दमों का क्या गुनाह
बिन पिये ए लड़खड़ाते हैं
दो बूँद शराब की
फिर से क़दमों में घुँघरू बंध जाते हैं
नचाती हैं जब दुनिया
बिन पिये ही ए बहक जाते हैं
ओर संभलने को फिर से
मयखाने चले आते हैं
आहिस्ता ही सही
भूल रंजो गम
सुरूर में इसकी
कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं
कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं
बिन पिये ए लड़खड़ाते हैं
दो बूँद शराब की
फिर से क़दमों में घुँघरू बंध जाते हैं
नचाती हैं जब दुनिया
बिन पिये ही ए बहक जाते हैं
ओर संभलने को फिर से
मयखाने चले आते हैं
आहिस्ता ही सही
भूल रंजो गम
सुरूर में इसकी
कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं
कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं