Wednesday, September 21, 2016

कदम

क़दमों का क्या गुनाह

बिन पिये ए लड़खड़ाते हैं

दो बूँद शराब की

फिर से क़दमों में घुँघरू बंध जाते हैं

नचाती हैं जब दुनिया

बिन पिये ही ए बहक जाते हैं

ओर संभलने को फिर से

मयखाने चले आते हैं

आहिस्ता ही सही

भूल रंजो गम

सुरूर में इसकी

कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं

कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं

माया

कुदरत कैसी हैं तेरी माया

हर तरफ़ उसका ही हैं साया

क्या खबर उस दिल को

इस घरौंदे में

नशा उसका ही हैं छाया

हर मोड़ मिल जाती उसकी ही छाया

बिन कहे ही वो करीब चला हैं आया

ए खुदा कैसी तेरी हैं यह माया

दिल की इस बंजर जमीं को

तूने ही खिलखिलाना हैं सिखलाया

Tuesday, September 13, 2016

नींद

तारों भरी रात में

नींद आज फिर से दगा दे गयी

चाँद के इन्तजार में

हमें तन्हा अकेला छोड़ गयी

राह तकते तकते

मानों सदियाँ गुजर गयी

नयनों से जैसे निंदिया महरूम हो गयी

छिप गया ओझल होकर ना जाने वो कहा

निंदिया भी उसकी तलाश में

आँखों से भटक गयी

खुली पलकों में स्याह रात गुजर गयी

पर वो चाँद ना निकला

जिसके इन्तजार में रात ढल गयी

नींद आज फिर से दगा दे गयी 

Tuesday, September 6, 2016

अमृत बूँदों की मिठास

मौन क्यों हैं तू घटा आज

बरसी नहीं क्यों फिर बदरी आज

प्रचंड ताप सूर्य ने हैं दिखलाया

जल रही मरुधर की भी छाया

मच रहा हाहाकार चहुँ ओर

रुंदन कर रही धरती भी आज

बिन जल मृत्यु शैया पर लेटी हु आज

मृगतृष्णा के भँवर में

लुप्त ना हो जाए सागर कही आज

अस्तित्व ही कुदरत का

लग गया मानो दांव पे आज

इसलिए गरज बरस घटा फिर से आज

ताकि मिल जाए जीवन अस्तित्व को

अमृत बूँदों की मिठास  

अमृत बूँदों की मिठास

Monday, August 29, 2016

अजनबी कशिश

उस रूह के हम गुलाम हो गए

दिल जिससे कभी रूबरू हुआ नहीं 

कुछ ऐसी वो अजनबी कशिश थी

खाब्बों में जिसकी धुँधली सी तस्वीर थी

रंग कैसे भरता इस मौशिकी की ताबीर में

क्योँकि  मिली ना वो परछाई थी

गुलामी जिसकी सर चढ़ आयी थी

मंजर सपनों का ए बड़ा प्यारा था

दिल की फिजाओं को महकता जिसका आलम था

दीदार मगर उस रूह के अब तलक हुए नहीं

फिर ख्यालों में भी दिल 

कभी किसी ओर रूह को बेकरार हुआ नहीं

बेकरार हुआ नहीं