Saturday, August 19, 2017

स्वाभिमानी

माना ज्ञानी नहीं अज्ञानी हूँ मैं

फ़िर भी गुरुर से सराबोर रहता हूँ मैं

तिलक हूँ किसीके माथे का

महक से इसकी नाशामंद रहता हूँ मैं

नाज़ हैं ख़ुद पे बस इतना सा

अभिमानी नहीं स्वाभिमानी हूँ मैं

अपनों से फिक्रमंद नहीं रजामंद हूँ मैं

दिल की दौलत से ऐसा सजा हूँ मैं

फ़कीरी में भी अमीरी से लबरेज़ रहता हूँ मैं

ना ही मैं कोई संत हूँ ना ही कोई साधू हूँ

फ़िर भी एक सच्चा साथी हूँ मैं

क्योंकि

अभिमानी नहीं स्वाभिमानी हूँ मैं 


2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-08-2017) को "चौमासे का रूप" (चर्चा अंक 2702) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर रचना

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