Monday, September 11, 2017

शिकायत

शिकायतों का तुमने ऐसा पहाड़ बना दिया

ना ख़ुद हँस के जिये, ना हमें जीने दिया

अम्बर से ऊँचा ऐसा अंबार लगा दिया

जीना दुश्वार हो, दिवास्वप्न बन रह गया

कुंठाग्रस्त भावना से ग्रसित मर्ज ने

शिकायतों के बोझ तले हसीं को दफ़ना दिया

बेख़ुदी के आलम से हम भी बच ना पाये

हर लफ्जों में शिकायतों को शुमार देख

ख़ुद को अपना गुनहगार मान लिया

शिकायतों को भी शिकायतों से शिकायत ना रहे

इसलिए गुमशुदगी में नाम अपना दर्ज करा दिया

नाम अपना दर्ज करा दिया

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (13-09-2017) को
    "कहीं कुछ रह तो नहीं गया" (चर्चा अंक 2726)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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