खो गयी एक आवाज शून्य अंधकार सी कही l
सूखे पत्ते टूटने कगार हरे पेड़ों डाली से कही ll
उलझी पगडण्डियों सा अकेला खड़ा मौन कही l
अजनबी थे लफ्ज़ उस अल्फाज़ मुरीद से कही ll
तराशी चिंतन टकटकी निगाहें मूर्त अधूरी थी कही I
रूह चेतना थी नहीं शतरंज बिछी बाजी सी कही ll
सूखी गर्त रूखी स्याही टूटे कलम नोंक से हर कही l
पुरानी सलवटें कागज लिख ना पायी अरमान कही ll
परछाई साये सी मौन साथ चलती रही कदमों कही l
ढलान ठोकर गहरी समुद्रों उफनती लहरों सी कही ll
डूबी अधूरी बातें चिंतन बादलों पार सूर्यास्त सी कही I
मझधार गुमनामी छोड़ गयी बिखरे थे जज्बात कही ll
सुंदर
ReplyDeleteआदरणीय सुशील भाई साब
Deleteआपका तहे दिल से नमन
बेहतरीन
ReplyDeleteआदरणीय हरीश भाई साब
Deleteआपका तहे दिल से नमन
सुन्दर सृजन ।
ReplyDeleteआदरणीया मीना दीदी जी
Deleteआपका तहे दिल से नमन