Friday, November 6, 2009

निंद्रा

हे मानव निंद्रा से जागो

जीवन सार को पहचानो

गीता उपदेश को जानो

सब कुछ यही रह जाना है

फिर क्यो करो भेद भाव

आओ मिलके रहे अमन के साथ

जो बदलनी किस्मत धरा की आज

तो मानव अब तू निंद्रा से जाग

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