Friday, November 27, 2009

लहर

साहिलों से टकराकर मौजे वापस लोट आई

उठी जो ऊँची लहर कस्ती डूबा गई

शांत हुई जब लहरे

कस्ती भी पहचान न आई

लुट गई किस्मत

बह गई जिन्दगी

रह गई सिर्फ़ गमों की बस्ती

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