Friday, October 2, 2026

गुनाह

फासले चाँदनी स्पर्श बँधी थी हर जानिब ख्वाहिश राग सी I

सन्नाटे हर लहजे साजिश छवि थी कादंबिनी सर्द रात सी ll

 

सीते सीते दर्द किताब रूह पैबंद सिमटी चटक गांठ सी l

बिखरे आईने एक अपरिचित ताबीर थी अमावस रात सी ll

 

लफ्जों आईने अगन लौ जली गुनाह रंजिश मुराद सी l

दिलों कबूल हुई ना महरूम यादें बिन पानी बरसात सी ll

 

ताउम्र आरजूएँ गुजारी जिस साहिल फरियादी आस सी l

हिना सहर यादें कर्ज भूल गयी घने कोहरे गोधूलि साँझ सी ll

 

सुन खबर जनाजे की रुखसत हो गयी यादें दुल्हन साज सी ll

काफिर को वो कफन पहना गयी बुझा शमा चिता राख सी ll

 

Saturday, September 12, 2026

बिडम्बना

टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को I

काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को ll

 

बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को l

मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll

 

बदरंग ना हो फटा आँचल अनचाहे तेजाब खारे पानी को l

अस्तित्व उलझी उलझी मौन घूंघट ओढ़नी नीम झाड़ी को ll

 

पलकों टपकती नूर माँगी दुआएँ सोई आँसुयें बरसातों को l

विरासत लिखी सूखे पानी तरसते कंठ मरुधर आँगन को ll

 

बिलखती व्याकुल पिपासा सूखे आँसू कांटों लिपट रोने को l

मुरझाई कपोलें खोई मरूधरा शीतल रातें मझधार साये को ll


Tuesday, August 4, 2026

रोती बारिश

तालीम सावन नयी सीखा गयी नीलामी मुनादी सौदागरी को l

रात परछाई बारिश बूँदें बेच आयी रोते खारे आँसू पानी को ll


बादलों अमिट छाप थी उसके अर्ध चाँद हुनरमंद कलाकारी को l

मोल समझ ना पायी जुल्फें इसकी पलकों रिसते खारे पानी को ll


बिन रूह जिस्म को भा गयी तंग गलियाँ इसके आँगन को l

दागों अनगिनत पैबंद कढ़ी इसके एकांकी एकांत साये को ll


किनारा कर आसमाँ आँचल बाँध दिया रोती बारिश यादों तन्हाई को l

टकरा काँच दीवारों से थम गया शोर इसका उफनते बारिश पानी को ll


नजरबंद थी तमाशबीन रोती आँसू आँखें सावन की परछाई को l

चाँद शांत हृदय भीगता रहा ताउम्र अपने ही खुदगर्ज फ़साने को ll

Thursday, July 2, 2026

काग़ज़ फूल

खो गयी परछाईं उस अलख जगाते अर्ध चाँद की l

पतंग मांझे डोरी उलझ चटकी चरखी पायदान की ll


कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l

आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll


स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l

टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll


टूटी निंद्रा केशों वेणी गुँथी मन बावरे नादान की l 

फिसली धड़कन लकीरें उस मोक्ष संगम चाह की ll


मिटा गयी तारीख उस गुलाबी सर्द काग़ज़ फूलों साँझ की l

डस गयी जिसे ग्रहण रेखा एक अंतिम आलिंगन पुकार की ll

Sunday, June 7, 2026

गुजारिश

गुजारिश थी मेरी शबनमी मोती बूँदों की बोलती लिखावट कहानी की l

सदियाँ ना लगाना कोरे कागज लिखे मौन अल्फाजों सुनने जुबानी सी ll


निहारना शहद घुली मीठी चासनी सलवटें इस एकांकी वर्णन की ll

पढ़ने जिस खुली अधूरे प्रेम ग्रंथ को बैचैन था वो मेरा चाँद भी कभी ll


बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l

जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll


इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l

खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll


टूटी कलम नोंक लिखती रही आखर टेढ़े मेढ़े डुबो खुद को सरोबार रंगों में l

कतरन उन पुरानी पैबंद लगे किताबों की खोई रही यादों की इस अलमारी में ll

Thursday, May 21, 2026

वैतरणी

लाजमी थी गलतफहमियां मधुशाला क़ुरबत आलिंगन हाथ में l

मदहोश थी दहलीजें इसकी नजदीकियां अफ़साने आँगन खास में ll


रंग ज़माने खुदगर्जीयों के थे बहरूपिये मयखाने सरूर रफ्तार में l 

नाजुक थी कड़ियां इसके मजहब तालीम छलकते जामों प्याम में ll


पूरी थी जिन्दगानी इसकी रूह कडियों महफ़िलों सजती शाम में l

शून्य भी शृंगार सा था इसके कायनात पटल चमकते अर्ध चाँद में ll


इन्द्रधनुषी पगडण्डियाँ सी रोशनी मधुशाला छलकते नयनों खोये जाम में l

तर गयी कंठ वैतरणी भूल काफिर पीड़ा सुरा के अस्तित्व खोई दालान में ll


मीमांसा फिर पहरेदारी थी मदिरा की अनकही प्रतिक्रिया समीक्षा राज में l

जीना फिर से सीखा गयी इसकी तवायफ कोठी अपने आँचल अंदाज़ में ll

Thursday, May 7, 2026

आलिंगन

तू ही मेरी वो पाठशाला जिस नदी का मैं ठहरा हुआ किनारा l

संभली नहीं किताब वो कभी अक्स तेरा जिसमें लगे पुराना ll


पेंसिल से नाम मेरा लिख मिटाना दूरियाँ चाँद फासलों समझाना l

लिखावट सी बन गयी वो मेरी साँसों रूह ज़िल्द कागज पन्नों की ll


बेमिसाल नादानियाँ तेरी गिली रेत बनाते महल चित्र आकारों की l

अमिट छाप मोहर बन गयी इस शागिर्द के बचपन मुलाक़ातों की ll


तू ही मेरा आसमाँ तू ही चाँदनी इस बंजर पहेली आरज़ू की l

अनछुआ स्पर्श भीगते बारिश तेरी बनाई कागज कश्ती की ll


रेखा लकीरें छांव सी यादें मुलाकातें तेरे सूखे गुलाब खुशबु की l

मधुशाला कस्तुरी बन गयी वो मेरी आलिंगन अलबेले साँझ की ll

Saturday, April 18, 2026

पारिजात

अक्सर आधी चाँदनी रातों को बाहें फैला आसमाँ से बातें करता हूँ l

कहानी उसके गजरे खुशबु की पारिजात को सुनाया करता हूँ ll


ललाट पर बिंदी की वो मोहर गालों की रुखसार बताया करता हूँ l

बालियों की धड़कनों से उसकी लहराती केश लट्टे उलझाया करता हूँ ll


नमी उसके आँखों की अपने काजल से पलकों बंद कर लेता हूँ l

डोरी उसके दिल पतंगों की दूसरी मांझे पेंचो से बचाया करता हूँ ll


तारूफ सुन उस चाँद की पता पूछने लगा आसमाँ चाँद भी l

कहा ठहर कोरी कल्पना नहीं घूंघट हटा दिख जायेगा पास अभी Il


तूने इत्र सा महकाया आँचल छोर बना राधा प्रेयसी रूप जिसका l

ये चाँदनी सहेली पता ना पूछ उस पागल चितचोर दिल तरन्नुम का ll

Wednesday, April 8, 2026

अलमारी यादों की

हृदय वात्सल्य स्पन्दन बादलों कश्ती सवार क़ुरबत खोजे तेरे पहलू पास l

एहसास बंदगी आरज़ू फलसफा भूली देख फरिश्तें आयतें गहराई साथ ll


खामोश गुजारिशें अल्फाजें आफताब जुस्तजू हसरतों मेहंदी रातों की बात l

मासूम स्वप्निल इश्क मुख्तसर क़ासिद भेजे ताज महल सी फरियादी आस ll


गुस्ताखियां नाजुक लबों खोई कोई कमसिन सुनहरी जादुई आवाज l

मुन्तजिर तलाश रही फासलों रुकी हर लहजे सुकून भरी वसल आगाज ll


दिवास्वप्न सरगोशी सी गूँजती मेघ मल्हारों तरुणी सोंधी सोंधी तरंग मुस्कान l

कई खतों पैगाम बादलों ने लिख भेजे आगोश सितारों आरज़ू माहताब नाम ll


अलमारी यादों की गुफ़्तगू करती लकीरें हाथों फकत रहनुमों बरसातों साथ l

रिवायतें साहिलों की तोहफा नजराना दे आयी तेरे पाकीजा नूर अंदाजों साथ ll

Tuesday, March 10, 2026

नीलामी

कल बाजार वो मुर्दों का श्मशान सटोरियों को नीलामी बेच आया l

मजमा लगा कब्जे का कब्र खोद चिताओं का आसमाँ बेच आया ll


बेख्याली काफिर नींदों दुनिया को ख्वाबों खिलोनों रूप दे आया l

शून्य मझधार कठपुतली स्वाँग रचा दर्पण प्रतिबिंब रूप दे आया ll


खुशबु चंदन सजा भस्म चिताओं सौदा आकंठ लालच से कर आया l

हुनर जौहरीयों को टूटे आईने स्वप्निल चमकता इश्तहार बेच आया ll


अनुबंध टूटा जो साँसों से बंजारी धड़कनों को दफन कर आया l

ख्यालों अह्सास परे जिंदा मुर्दों को मुर्दों का श्मशान बेच आया ll


हर पायदान कहानी नई बुन ठगों बीच सूनी सी पदचाप छाप छोड़ आया l

आहट द्वारे मोक्ष कांपते हाथों रूहों तिलांजलि दे अशर्फीयाँ खरीद लाया ll

Wednesday, February 4, 2026

पीताम्बरी

गोधूलि साँझ रिमझिम ओस लटों सेज क्षितिज धरा बेलों लाली से l
मिट्टी धागों कायनात निखर आयी थी बुनकर चरखे सायों स्याही से ll


कोरे सादे कागज मिथ्या सत्य सी खोई थी परछाई कपोल नजारों से l
इशारों महकी उल्फतों ने लिख डाली सौगात आयतें महताब लाली से ll


झूम उठीं कठपुतली पीताम्बरी रिमझिम रंगीन बदरी बरसातों से l
फिसलती अंगुलिया अंगड़ाई काश्तकारी ने पायदान रंगी रूहानी से ll


जुस्तजू रूह बँधी थी जिन पतंगे पेंच गजलों बाज निगाह कहानी बंदगी से l
जिक्र उस आरज़ू सहर बदनाम हो गयी दीवारों की कानाफूसी गुफ़्तगू से ll


मेघों हिलोरी आतिशबाजी से कूची रंग भर गयी आसमाँ कला बाजी से l
इन कड़ियां अठखेलियों से कहानी एक नयी पपोल आयी पीपल पीछे से ll

Saturday, January 17, 2026

ll धैर्य ll

हौसला रख संघर्ष कर हर कदम अपने आप से l
थकना नहीं रुकना नहीं हार कभी नियति सामने ll


कर नजरअंदाज अपूर्णता थाम निपुणता कला हाथ में l
लक्ष्य मंजिल दूर हो के भी दूर नहीं रख ज़ज्बा साथ में ll


बदल लकीरें हाथों की रेखाएं मस्तिष्क ललाट की l
विधि विधमान विराजेगी बदल तकदीर ज्वार में lI


अर्पण होगा जीवन जब सीखने खुद की खामियों पास में l
लक्ष्य हिमालय बेंध जायेगा अर्जुन सरीखे प्रतिबिंब छांव से lI


अमूल्य हैं समय कोई दूजा तेरी साँसों वरदान सा तुल्य नहीं l
अंधेरे कभी डरना नहीं मिलेगी विजय विचलित तू कभी होना नहीं ll


विचलित तू कभी होना नहीं, विचलित तू कभी होना नहीं ll

Sunday, January 4, 2026

महासमर

तहजीब बाजीयाँ मोगरा गुलाब कांटों खुशबुदारी की l

कायनात सहर भीगें नयनों अक्स ओस पहरेदारी की ll

 

स्वरांजलि दीप ध्वनि हिम पटल शिखर लहर मझधारों की l

गाथा चिंतन कहानी नयी बादलों के स्वरूप संसारों की ll

 

अंतरंगी धागे प्रचंड अलाव तपिश सुनहरी धूपों की I

क्षितिज मेरुदंड गुँथ रही इन्द्रधनुषी वैतरणी अनुरागों की ll

 

लिपिबद्ध हो केशवों झांझर मेहंदी पंखुड़ि हाथों की l

कह रही नयी चेतना काफिर आवारा हवाओं की ll

 

ख्यालातों के खाली ज़िल्द पर पानी स्याही अल्फाजों की l

लिख गयी नाजुक गठबंधन महासमर प्रयासों की ll

 


Sunday, December 21, 2025

पंजरी

सर्द हवाएँ ख़यालों होले से झूमकौ फुसफुसा गयी एक मिठी सी राग l

नाजुक हवाएँ पूछ रही पता उस अक्स तलब जिसकी थी कभी पास ll

 

कानाफूसी रूमानियत थामी थी सोंधी सोंधी पंजरी सी मुस्कान l

परिचय पूछ रहा अल्हड काजल कहा छुपी थी आँचल मनुहार ll

 

सौम्य काव्यअग्नि रूप सृष्टि माथे ललाट प्रतिबिंब चंदन आकार l

गुँथे घूंघट पीछे सहज संक्षेप लिख गयी एक सांची चंद्र आधार ll

 

उलझा बिखरी केश लट्टे वेणी सी सज गयी सुरमई साँझ कर्णताल l

सलाह चंचल गुदगुदी पायल सुना रही कोई सुन्दर कहानी संसार ll

 

कानाफूसी बीचों बीच थम थम बरसी जोगन सी मेघ सुर करताल l

ओस बूँदों ढ़की पलकें शागिर्द सी नाच उठी नींद सिरहानों साथ ll

 

 

Monday, December 15, 2025

अकेला क्यों

कुछ फटे बदरंगे अध लिखे पन्ने किताबों के संभाल रखने को दिल करता हैं l

इसकी कोई धुंधली तस्वीर जाने क्यों आज भी अक्सर अकेले में बातें करती हैं ll


हसरतें इसकी काले गुलाबों सी हवाओ को जब अपना दर्द बयां करती हैँ l

बिसरी मंजिलें सगर चंदन खुशबु यादें लपेटे पिंजर से आजाद हो आती हैं ll


धब्बे पानी के अंगुलियों जब सहलाती हैं चुभन अक्षरों को सिरहा जाती हैं l

लेखनी रिसता अश्रु सागर इसके पनघट छाया कतरा कतरा लहू बन आती हैं ll


शून्य इसके घाटों का पदचापों की पहचान रोशनी प्रतिबिंब बन दर्द दे जाती हैं l

मैं अकेला क्यों इस उलझन को इबादत की पहेली आदत और उलझा जाती हैं ll


हवाएँ साँसों की बातें इनसे जब करती हैं रूह थम सहम आती हैं l

परछाईं तलाश सुकून अहसासों की ग़म कुछ देर को भूला जाती हैं ll

Wednesday, December 10, 2025

ll अंतिम अरदास ll

स्पर्श सफर रूह ठहरा था जिस जिस्म अंगीकार को l

भस्मीभूत हो गया पंचतत्व कह अलविदा संसार को ll


वात्सल्य छवि अर्पण निखरी थी जिस मातृत्व छाँव को l

ढ़ल चिता राख तर्पण मिल गयी गंगा चरणों धाम को ll


मोह काया दर्पण भूल गया उस परिचित सजी बारात को l

संग कफन जनाजे जब वो निकली सज सबे बारात को ll


अवध दीपावली तोरण सजी थी जिस शामें बहार को l

छोड़ किलकारी आँचल बिसरा गयी बचपन साँझ को ll


अतिरिक्त साँसे पास थी नहीं अंतिम सफर अरदास को l

वरदान अभिषप्त आँसू शान्त खो गये रूठे श्मशान को ll

Sunday, December 7, 2025

परिदृश्य

हैरत हुई ना किश्तों उधार मिली यादों दरारों में l

इल्तिजा ठहरी नहीं चहरे शबनमी बूँदों दरारों में ll


खोई सलवटें सूने आसमाँ तुरपाई गलियारों में l

छुपा गयी गुस्ताखियां आँचल पलकों सायों में ll


सुरमई बादल पनाह काजल निगाह घनेरो में l

कोई रंजिशें पैबंद ठगी अधखुली कपोलों में ll


बिखरे केशों लिपटी लट्टे झुर्रियां दर्पण लहरों में l

तस्वीरें धुंधली बदलती लकीरें हाथों मेहंदी में ll


ख्वाबों ख्यालों परिदृश्य फिराक दीवारों परिधि में l

लकीरें हाथों मिट गयी उलझन भरे अंधियारों में ll

Tuesday, December 2, 2025

एक आवाज

 खो गयी एक आवाज शून्य अंधकार सी कही l

सूखे पत्ते टूटने कगार हरे पेड़ों डाली से कही ll


उलझी पगडण्डियों सा अकेला खड़ा मौन कही l

अजनबी थे लफ्ज़ उस अल्फाज़ मुरीद से कही ll


तराशी चिंतन टकटकी निगाहें मूर्त अधूरी थी कही I

रूह चेतना थी नहीं शतरंज बिछी बाजी सी कही ll


सूखी गर्त रूखी स्याही टूटे कलम नोंक से हर कही l

पुरानी सलवटें कागज लिख ना पायी अरमान कही ll


परछाई साये सी मौन साथ चलती रही कदमों कही l

ढलान ठोकर गहरी समुद्रों उफनती लहरों सी कही ll


डूबी अधूरी बातें चिंतन बादलों पार सूर्यास्त सी कही I

मझधार गुमनामी छोड़ गयी बिखरे थे जज्बात कही ll

Wednesday, November 5, 2025

खण्डित विपाशा

थक गयी आत्मा पत्थरों के संवेदना बिन शून्य शहर को l

अजनबी थी खुद की ही रूह जिस्म को जिस्म रूह को ll


गर्द घूंघट ढाक गयी नज़ारे आसमाँ नन्हें फरिश्ते सितारों को l

ओढ़नी बादलों की बातें भूल गयी पिघल बरस जाने को ll


विडंबना अक्षरः सत्य बदल गयी गजगामिनी हंस चालों को l

वैभव मधुमालिनी कुसुम रसखानी भूल गयी मधुर तानों को ll


अपरिचित सा ठहराव यहां रफ्तार आबोहवा बीच रातों को l

अदृश्य विचलित मन सौदा करता गिन गिन साँस धागों को ll


हाथ छुटा साथ छुटा बचपन लूट गया इन अंध गलियारों को l

बिखर पारिजात शाखा से ढूंढता घोंसला बबूल काँटों को ll


बदरंग दर्पण अतीत ओझल अकेला खड़ा रेतो टीलों जंगल को l

खण्डित विपाशा अनकहे हौले से बदल गयी रूह कुदरत को ll

Thursday, October 16, 2025

अकेला समय

स्पर्श स्पन्दन खामोश अधरों उलझेअधूरे अल्फाजों की l

तस्वीर एक ही उकेरती सूनी सूनी पत्थराई आँखों की ll


पैबंद लगी तुरपाई हुई काश्तकारी रूह इसके सपनों की l

बिनआँसू सुई सी चुभती सीने दिल टूटे अरमानों की ll


समय अकेला समर गहरा संबंध विच्छेद नादान सा l

कटाक्ष बाण चक्रव्यूह रण निगल गये निदान काल सा ll


मुखबिरी व्यथित बदरंग इनके रुदन शब्द आवाजों बीच l

मुनादी कोलाहल बेंध रही छाती कर्णताल ध्वनि धैर्य बीच ll


रोम रोम कर्जदार पाटों की इन बिखरी चट्टानों बीच l

लुप्त हो गयी तरुणी सागर कहीं इसके क्षितिज तीर ll