Saturday, September 23, 2017

वट वृक्ष

समय के थपेड़ों ने सबक़ ऐसा सीखा दिया

लोहा भी आग में दमक

सोना सा निख़ार पा गया

सम्बोधन काल चक्र ऐसा बना

वाणी स्पर्श मात्र से

चिराग रोशन हो गया

अभिव्यक्ति की इस अनमोल धरोहर ने

सूत्र प्रकाश पुंज ऐसा प्रज्वलित कर  दिया

अँधेरे में भी रौशनी का आभास हो गया 

लगन समर्पण विचरण

छूने नभ आतुर हो गया

आधार आकार शून्य संगम

धुर्व तारा सा बन चमक गया

बदलते परिवेश के उतार चढ़ाव ने

इस रंगमंच को आयाम नया थमा दिया

अध्याय फ़िर ऐसा खूबसूरत प्रारंभ हुआ

जड़ चेतन ज्ञान वट वृक्ष बन गया

 ज्ञान वट वृक्ष बन गया

ख़ुमारी

नींद को जागते रहने की ख़ुमारी लग गयी

नयनों को जाने कौन सी बीमारी लग गयी

बोझिल पलकों को तारों संग

चाँद को निहारने की आदत लग गयी

फ़ितरत नींद की ऐसी बदल गयी

जाने इसे किसकी नज़र लग गयी

खुली शबनमी पलकों की सिफ़ारिश भी यूँही रह गयी

बिन करवटें ही आँखों में रात ढल गयी

नींद की मासूमियत तन्हाइयों में जाने कहा खो गयी

हर रात एक सदी सी

लम्बी दासताँ बन गयी

नींद को जागते रहने की ख़ुमारी लग गयी

ख़ुमारी लग गयी

लाशों का दरिया

जिन्दा लाशों का दरिया बन गया मेरा शहर

रूहों का यहाँ नहीं कोई हमसफ़र

बिक गयी मानों यहाँ हर एक आत्मा

तुच्छ विपासना हवस के आगे

मय्यत भी मानों दफ़न ऐसे हो गयी

अपनों के ही आँसुओ को जैसे तरस गयी

वैश्या बन गयी यहाँ हर एक चेतना

भूल ज़मीर को कोठे की दहलीज के आगे 

मोहताज हो गयी राहों को अंतरात्मा

विलुप्त होते संस्कारों में कहीं

रंज इसका रहा नहीं किसीको भी यहाँ जरा

बिन रूह जिंदगी का कोई मौल नहीं

 बिन रूह जिंदगी का कोई मौल नहीं

 

Wednesday, September 13, 2017

तेरे ही नाम

नाम तेरा हम गुनगुनाते रहे

अफ़सोस मगर

समझ ना पाये तुम इन अफसानों को

खोये रहें तुम अपने ही फ़सानों में

मुज़रिम बना दिया मुझे अपने सवालों से

तुम समझ ना पाये बात मेरे इशारों की

कि 

आरजू इस दिल ने बस इतनी की

मौत जब आये

पैगाम आख़री भी तेरे ही नाम हो

तेरे ही नाम हो

Tuesday, September 12, 2017

दास्तानें उलझनों की

कोशिश बहुत की

समेट लूँ कुछ उलझनें अपनी

हैरान आश्चर्य चकित रह गया

पहेलियों सा जाल इसका देख कर

छोर मगर उसका ढूंढ ना पाया

धड़कने भी अपनी रोक के

बदहाल बेहाल हो गयी साँसे

दास्तानें उलझनों की सुन के

दास्तानें उलझनों की सुन के

इकरार

इस जिंदगी को मोहब्बत रास आयी नहीं

सपनों के बाहर की दुनिया पास नहीं आयी

काश महबूब ने पहले किया होता इकरार

जिक्र हमारा भी फिर होता चाँद के साथ 

इस हक़ीक़त से अब कैसे करे इंकार

लबों पे नहीं अब तलक इकरार

पर आँखों से कैसे करे इंकार

इशारों में ही एक बार कह देते वो बात

सुनने दिल जिसे मुदत्तों से था बेकरार

सुनने दिल जिसे मुदत्तों से था बेकरार 

खता

खायी हैं चोटें बहुत इस दिल ने

खता हमारी क्या

दिल किसी का तोड़ दे

माना जज्बातों का कोई मौल नहीं

पर दिल के भँवर के आगे

इंकार पे जोर नहीं

लब मगर कह ना पाए वो जज्बात

क्योंकि मशूगल रह गया दिल

निहारने में महताब

निहारने में महताब

Monday, September 11, 2017

शिकायत

शिकायतों का तुमने ऐसा पहाड़ बना दिया

ना ख़ुद हँस के जिये, ना हमें जीने दिया

अम्बर से ऊँचा ऐसा अंबार लगा दिया

जीना दुश्वार हो, दिवास्वप्न बन रह गया

कुंठाग्रस्त भावना से ग्रसित मर्ज ने

शिकायतों के बोझ तले हसीं को दफ़ना दिया

बेख़ुदी के आलम से हम भी बच ना पाये

हर लफ्जों में शिकायतों को शुमार देख

ख़ुद को अपना गुनहगार मान लिया

शिकायतों को भी शिकायतों से शिकायत ना रहे

इसलिए गुमशुदगी में नाम अपना दर्ज करा दिया

नाम अपना दर्ज करा दिया

Saturday, September 9, 2017

एक बार फ़िर

चल आज एक बार फ़िर बहकने चलते हैं

लड़खड़ाते कदमों को सँभालने चलते हैं

ना मंदिर ना मस्जिद, थाम खुदा का हाथ

मधुशाला के द्वार चलते हैं

रहमों कर्म से, बिरादरी से इसकी

रूबरू खुदा को भी कराते हैं

हर मर्ज की दवा इसके साये में

खुदा को भी यह दिखलाते हैं

कैफियत के इसके रंगों से

चल एक बार खुदा बन जाते हैं

लड़खड़ाते कदमों को सँभालने चलते हैं

चल आज एक बार फ़िर बहकने चलते हैं

चल आज एक बार फ़िर बहकने चलते हैं



Thursday, September 7, 2017

कर्मों के फल

अंतर्नाद का नाद हैं ये

ख़ुद से संघर्ष का रणभेदी आगाज़ हैं ये

पल प्रतिपल बदलते विचारों में

सामंजस्य पिरोने का सरोकार हैं ये

महा समर के चक्रव्ह्यु का

यह तो एक अध्याय हैं बस

संयम साधना ब्रह्मास्त्र ही

एकमात्र इस पहेली का राज हैं बस  

तपोबल ज्ञान से इसके

लक्ष्य दूर नहीं होगा तब

दृष्टि भ्रम से जब विचलित ना हो पायेगा मन

इसके एकांतित ध्यान केंद्र में ही

समुचित हैं सब आस्था के फल

सब आस्था के फल

नींद

रात गुजरती नहीं सुबह चली आती हैं

नींद एक अदद फिर मुकम्मल हो पाती नहीं

विपासना साधना में तल्लीन मन

स्वांग आडंबर का रचाती हैं

ना जाने कैसे सपनों की धरोहर हैं ये

अमूल्य नींद के पलों को बेआबरू कर जाती हैं

बचपन में अर्जित नींद की अस्मत को

क्योँ फटेहाल किस्मत तार तार कर जाती हैं

सपनों की सौदागिरी में

शायद नींद भी कहीं बिक जाती हैं

परवान चढ़ते इस समझौते से

बिन थपकी ही रात पहर गुजर जाती हैं

और बिन नींद मुकम्मल हुए

सुबह चली आती हैं

सुबह चली आती हैं

Friday, September 1, 2017

उम्र की चाबी

उम्र तो जिंदगी की दहलीज़ का बस एक पैमाना हैं

जिन्दा रहने को साँसें भी एक बहाना हैं

संघर्ष ही इसके अंदाज का आशियाना हैं

लुफ्त तभी हैं इसे जीने का

कारवाँ बेशक गुज़र जाये उम्र का

पर बचपन आगे और बुढ़ापा पीछे चलने की क़वायद सारी हैं

राहगुजर के इस पड़ाव में

उम्र का यह अपना ही हसीन फ़साना हैं

वैराग्य के इस राग में छिपे

जिंदगी के राज

बड़े मतवाले आशिक़ हैं

गुज़र गयी जो

वो तो बस एक कहानी हैं

उम्र तो बस साँसों की गुजारिश हैं

ग़ौर ना फरमाइये उम्र के पहलू पर

जब तलक दिल से जीने की ललक बाकी हैं

उम्र के तिल्सिम पिटारे की

बस यही एक चाबी हैं


Thursday, August 24, 2017

अज़ान की दस्तक

नींद आज फ़िर उचट गयी

बातों में उनकी रात ढल गयी

जिंदगी के शोर में डूबी

रफ़्तार कुछ पल थम गयी

अज़ान की दस्तक

कहानी अधूरी छोड़ गयी

रूह की इबादत से महकी

भीनी भीनी खुश्बुएं नगमा एक नया छेड़ गयी

जाते जाते फासलों के दरम्यां  भी

जीवन रिश्ते की डोर बाँध गयी

नींद आज फ़िर उचट गयी

बातों में उनकी रात ढल गयी

नींद आज फ़िर उचट गयी 



साँझ के पैगाम

बहक रहें हैं साँझ के पैगाम

निहारुँ कैसे दरिया में आफ़ताब

नशे में चूर हैं आसमान

निखर रहा मेहताब का आब

छा रहा जैसे यौवन प्रकाश

खुल रहे मधुशाला के द्वार

कंठ भी बैचैन

बनाने मदिरा को गलहार

डूब जाए इस पहर में

करवटें बदलती रातों के साथ

शामे ग़ज़ल बन जाने को

पाँव भी हो रहे हैं बेताब

सुन सितारों की धुन

देख चाँद का अंदाज

बहक रहें हैं साँझ के पैगाम

Tuesday, August 22, 2017

खबर

ख़ुद में हम यूँ मशगूल रहे

खबर अपनों की भी ना रहीं

साँसे चल रहीं या ठहर गयी

धड़कने भी इससे अंजान रहीं

मुद्दतों बाद एक सकून मिला

ख़ुद से रूबरू हो

गुफ्तगूँ करने का अवसर जो मिला

सोचा परख लूँ

क्योँ ना फ़िर अपने आपको

दो चार दिनों बाद

कभी तो करना होगा सामना

इठलाके आती हुई साँझ से

मुलाक़ात इसलिए भी मुनासिब हैं

एक बार अपने आप से

राहें

राहें कुछ ऐसे गुम हो गयी

तन्हा चलते चलते मंजिल भटक गयी

पगडंडी भी कांटो का झाड़ बन गयी

अजनबी सी मानो पहचान बन गयी

चौराहों में चौराहों की जैसे राह सज गयी

कदम जिस ओर चले

तक़दीर वो राह भटक गयी

राहों की भूलभुलैया ने कायनात बदल दी

आती जाती मुड़ती राहों ने

सपनों के सौदागर की राह बदल दी

तन्हाइयों के आलम में

राहें कुछ ऐसे गुम हो गयी

ज़िंदगी खुद से अंजान हो गयी

Saturday, August 19, 2017

आनंद

उलझें रहे हम तुम सवालों में

रंगीन आसमानी नज़रों में

कभी चाँद कभी सितारें

ढूँढ रहे अपने जबाबों में

सुध बुध बस कुछ नहीं

तल्लीन वक़्त के ख्यालों में

हर हल में भी पेंच नज़र आ रहे

जैसे उलझ गए

अनसुलझे सवालों में

आनंद इसका भी अपना हैं

ब्रह्माण्ड के इन सुन्दर नज़रों में

विचलित नहीं होता मन

उलझें उलझें जबाबों से

इन पहेली बुझती राहों में

हमसफ़र बन गए हम तुम

खो रंगीन आसमानी नज़रों में

खो रंगीन आसमानी नज़रों में 

महफ़ूज

वो अक्सर ख्यालों में ही महफ़ूज रहे

सामने जब जब आए

नजरें चुरा के चले गए

अदा उनकी यह

मन को ऐसी भा गयी

मीठा सा दर्द बन दिल में समा गयी

अल्हड़ कमसीन नादाँ उम्र कुछ समझ ना पायी

ओर इश्क़ के मर्ज से खुद को महफ़ूज रख ना पायी

स्वाभिमानी

माना ज्ञानी नहीं अज्ञानी हूँ मैं

फ़िर भी गुरुर से सराबोर रहता हूँ मैं

तिलक हूँ किसीके माथे का

महक से इसकी नाशामंद रहता हूँ मैं

नाज़ हैं ख़ुद पे बस इतना सा

अभिमानी नहीं स्वाभिमानी हूँ मैं

अपनों से फिक्रमंद नहीं रजामंद हूँ मैं

दिल की दौलत से ऐसा सजा हूँ मैं

फ़कीरी में भी अमीरी से लबरेज़ रहता हूँ मैं

ना ही मैं कोई संत हूँ ना ही कोई साधू हूँ

फ़िर भी एक सच्चा साथी हूँ मैं

क्योंकि

अभिमानी नहीं स्वाभिमानी हूँ मैं 


Friday, August 18, 2017

बेआवाज़

रातें ए बेआवाज़ नहीं

दरियाँ की क्या कोई पहचान नहीं

माना

धड़कनों के संगीत में

शोरगुल की कोई फ़रियाद नहीं

पर रातें ए भी बेआवाज़ नहीं

बड़ी मुश्किलों से कटता हैं यह सफ़र

क्योकिं बिन शोरगुल

इस जीवन की कोई पहचान नहीं

यतार्थ में सन्नाटे की चीत्कार

दिल के दरम्यां गुम होने की

कोई मिशाल नहीं

रातें ए बेआवाज़ नहीं

तोहमत

ओ महजबीन

फ़रमान आप ए क्या सुना गयी

तोहमत कभी ख्वाबों पर 

तो कभी आईने पर लगा गयी

बेजुबां थी अब तलक जो शख्शियत

दामन लफ्जों का उसे थमा गयी

बड़ी संगदिल निकली ओ महनशी

दिल  अरमानों को

लफ्जों का खेल समझा गयी

ख़्वाब जो कभी पिरोए थे

तारों को उनके झंझकोर गयी

जाते जाते

नयनों की भाषा को

आप क्यों लफ्जों से तोल गयी

लफ्जों क्यों से तोल गयी

Thursday, August 17, 2017

संयोग

कैसा ऐ संयोग हैं

लंबे अंतराल बाद

किस्मत आज फ़िर उस मोड़ पे ले आयी

सोचा था जिस राह से फिर ना गुजरूँगा

ठिठक गए कदम खुद ब खुद

पास देख उस आशियाने को

फड़फड़ाने लगे यादों के पन्ने

बेचैन हो गए दिल के झरोखें

फ़िर से यादों में खो जाने को

अहसास से ऊबर

भींगी नम पलकों को जो खोला

सामने आ गया फिर वो साया

कभी बहा ले गयी थी जिसे

परिस्थितियों की हताशा

मौन उसके लफ्ज थे

पर बयां कर रही आँखें उसकी

कुछ ओर नहीं

बस कर आलिंगन जीवन अंतिम बार

हो जाऊ रुखसत दुनिया से अभी

हो जाऊ रुखसत दुनिया से अभी

Saturday, August 5, 2017

पारदर्दिष्टा

यारों आज कल आँसू भी मुस्कराते हैं

जब कभी ऐ छलकते हैं

एक पारदर्दिष्टा रेखांकित कर जाते हैं 

ओर इस अंजुमन में

अपनों की जगह दिखला जाते हैं

दर्द के इस सफ़र की

बानगी यही हैं जानिये

इसके दर्पण में

अपने सच्चे अक्स को निहारिये

इस मुकाम की आगाज़ ही वो अल्फ़ाज़ हैं

जिक्र जिनका आंसुओ के मुस्कान में  हैं

जिक्र जिनका आंसुओ के मुस्कान में  हैं

Tuesday, August 1, 2017

कुछ पल

ऐ जिंदगी कुछ पल ठहर जा

इठलाने की उम्र अभी बाकी हैं

शरारतें अभी बहुत करनी बाकी हैं

माना दहलीज़ बचपन की गुज़र गयी

पर मुक़ाम बचपने का अब तलक बाकी हैं

यक़ीनन ठहराव उम्र को मिलेगा नहीं

लेकिन फ़िर से उस पड़ाव का छोर मिलेगा कहीं

अलविदा दुनिया को कहने से पहले

उम्मीद अब तलक ऐ बाकी हैं

वो शोखियाँ वो शरारतें

उनमें फ़िर से एक बार खो जाने का

जूनून आज भी इस उम्र पे हाबी हैं

क्या हुआ जो वक़्त गुजर गया

पर संग उसकी यादों के  जीने का

सफ़र तो अब तलक बाकी हैं

ऐ जिंदगी कुछ पल ठहर जा

इठलाने की उम्र अभी बाकी हैं





Friday, July 28, 2017

तरीक़े

जीने के तरीक़े तलाश रहा हूँ

शायद अपने आप को संभाल रहा हूँ

ठोकर गहरी इतनी लगी

फिर  उठने की कोशिश कर रहा हूँ

ना ही कोई खुदा हैं

ना ही कोई अपना हैं

जन्म मृत्यु के बीच का फासला ही

यथार्थ में कर्मों का ही रूहानी खेल हैं

आत्मसात हुआ इस ज्ञान का

जिंदगी रूबरू हुई जब अपने आप से

Friday, July 21, 2017

लकीरें

ना मैं छंद पढ़ता हूँ

ना व्यंग पढ़ता हूँ

मैं तो सिर्फ़

चहरे पे लिखी लकीरें पढ़ता हूँ

हर एक रचना की

बख़ूबी ताबीर पढ़ता हूँ

तामील करता हूँ

शामिल रहे इसमें हर वो इबादत

लिखी आयतें जिसमें

सिर्फ़ ख़ुदा के नाम की हो

यारों मैं तो फकीरों की तरह

लकीरों में भी बस दुआओं का असर टटोलता हूँ

मैं तो सिर्फ़

चहरे पे लिखी लकीरें पढ़ता हूँ 


Thursday, July 20, 2017

अनाम रिश्ते

रिश्ते कुछ अनाम अभी बाक़ी हैं

काँटो में भी रह

गुलाब की तरह खिलने की चाह अभी बाकी हैं

फ़रियाद महक से इसकी भी वही आती हैं

रंग जब अपने रिश्तों का जुदा नहीं

अड़चन फ़िर  कहा

मुझको अंगीकार करने में आती हैं

कहीं खुदगर्जी का आलम

कहीं ज़माने का डर

फ़िर भी जीवन डोर में पिरोने

कुछ अनाम रिश्ते अभी बाकी हैं

कुछ अनाम रिश्ते अभी बाकी हैं

Saturday, July 8, 2017

रुख

कह दो हवाओं से

रुख बदल ले जरा

हिज़ाब उनका सरका ले जाए जरा

हुस्न जो कैद हैं इसके पीछे

आज़ाद हो जाए नक़ाब से जरा

छिपा महफ़ूज रखा जिसे

दीदार से उसके हो जाए जरा

कह दो हवाओं से

रुख बदल ले जरा




Friday, July 7, 2017

ख़ामोशी

ख़फ़ा ना होना ए ख़ामोशी तू कभी

रिश्ते सारे झूठे

एक तुझ पे ही बस ऐतबार हैं

गुफ्तगूँ तुमसे मैं कर सकूँ

दर्द मेरा तू समझ सके

लफ्ज मौन ही सही

पर रक्तरंजित ह्रदय तो खोल सकूँ

इस दर्द की दीवानगी

सिवा तेरे कोई समझ ना पायेगा

लबों पे अब लफ्ज़ सजाऊ कैसे

अल्फाज जो कल मेरे अपने थे

आज वो रूठे रूठे बेगाने से हैं

राजदार तुम ही हो इस सफ़र की

हमसफ़र बन चलते रहना

बस एक तू ही वफ़ा की ताबीर हैं

बाक़ी सब तो सिर्फ़ एक कहानी हैं

रिश्ते सारे झूठे

बस एक सच्ची तेरी यारी हैं

Saturday, June 24, 2017

वाकिफ़

दुनिया कहती है तू निराकार हैं

पर मैं कहता हूँ मेरा हृदय ही तेरा आकार हैं

अहंकार नहीं यह जज्बात हैं

क्योंकि इसकी धड़कनों में

तेरी ही रूह का बास हैं

आत्मा से परमात्मा के मिलन का

यही एक सच्चा मार्ग हैं

ना मैं तपस्वी हूँ

ना ही मैं दानी हूँ

फिर भी संयम बल से ज्ञानी हूँ

इसीलिये

विधमान हैं तू इस दिल में

इस ज्ञान से मैं भी वाकिफ़ हूँ







Sunday, June 11, 2017

सात फेरे

मुस्कान ने उनकी कहर बरपा दिया

दिल की इस नाजुक जमीं पर

वज्रपात का कोहराम मचा दिया

आघात गहरा इतना था

सहम गया पूरा तन बदन

सदमा झेल ना पाया ए मन

ओर हो गया इसका चीरहरण

दिल भी यह कहां उनसे कम था

कम्बख्त ने बना लिया

उनकी हसीं को ही अपना हमसफ़र

बाँध लिया बंधन में उनको

फिर सात फेरों के संग

सात फेरों के संग

दो जाम

पिला दिए उन्होंने आँखों के जब दो जाम

हो गयी मदहोश रूह की चाल

फ़ना हो गया साया भी ख़ास

मटकायें उन्होंने जब नयनों के ताव

चढ़ गया सुरूर नशे का

पेंच लड़ गए जब उनके कजरों के साथ

ऐसी बरस रही मदिरा उनके नजरों के साथ

पीछे छूट गयी जिन्ने मधुशाल की हर बार

पैमाने छलक रहे अब इस दिल के

उनके नयनों के मयखानों के साथ

उनके नयनों के मयखानों के साथ

Tuesday, June 6, 2017

इंतजार

वेदना अपनी बयाँ ना कर पाया

किताब के पन्नों पे इसे उकेर ना पाया 

रोशनी चुरा ले गया कोई काफ़िर हमारी

भटका गया मंजिल से राह हमारी 

पाना जिस मंजिल को कभी हसरतें थी हमारी 

कशिश अधूरी रह गयी थी वो हमारी 

आलम अब तो बस बेबसी का संग था 

रूह जलाने को

यादों का अग्नि कुंड पास था

ना दरियां में अब वो तूफां था

ना हवाओँ में वो आगाज़ था

सुन ठहर जाती थी मंजिल जिसे कभी

अफसानों का वो तिल्सिमि पिटारा अब पास ना था 

बुझते चिलमन को रोशन रहने

उस शमा का फिर भी इंतजार था

फिर भी इंतजार था 

Sunday, May 14, 2017

भीड़ में

अक्सर मैं ख्यालों में खोया रहा

पहेली बन ख़ुद को टटोलता रहा

कभी सपनों की उड़ानों में

कभी उलझनों के नजारों में

पहचान ख़ुद की तलाशता फिरा

गुम रहे विचारों की ताबीर में

पर रूबरू खुद से कभी हो ना सका

उधेड़ बुन की इस कशमकश में

मैं भी शायद तन्हा खड़ा था

दुनिया की इस भीड़ में

दुनिया की इस भीड़ में

Wednesday, April 12, 2017

उम्र कैद

गुनाह मेरे ख्बाबों का कहा था

शरारत भी उनकी मासूमियत भरी थी

पेंच लड़े नयनों के थे

पतंग पर वो दिल की काट गए थे

लावण्य उनके रूप का ना था

फ़िज़ा में बहार उनके चिलमन की थी

गुलाब सी खिलती, इत्र सी महकती, हँसी उनकी

अनजाने में जुर्म ए करवा गयी

आजीवन उम्र कैद की बेड़ियाँ इन हाथों को पहना गयी


इन हाथों को पहना गयी

Sunday, March 19, 2017

अंशदान

वो ठहराव ही ना मिला जिसका इंतजार था

माना धाराओं का वेग कही शांत तो कही प्रचंड था

पर लहरों के थपेड़ों से टूटते

किनारों का मंजर ही सिर्फ सामने था

हर गुजरते लहमों का इसे बखूबी अंदाज़ था

पर कहने को भी पास अपने

इस जिंदगानी का हिसाब ना था

कभी दरख़्तों में तो कभी पर्वतों में

खो जाने का जूनून जो साथ था

पास इसके भी मगर

बिखरी मंजिलों का सच साथ था

शायद रूह का

आँधियों से लड़ने का हौसला पस्त था

चमक भी वो विलुप्त सी प्रतीत थी

समर बेंधने की कला में जिसे पारंगत हासिल थी

शून्य भँवर का वेग भी

कुछ ऐसा ही गतिमान प्रतिबिंबित सा था

साधना पल, ध्यान भी मानो

रूह से अपनी विरक्त सा था

ठहराव की इस व्यथा में

मानो सृष्टि की संरचना का भी

अपना कुछ अंशदान सा था

कुछ अंशदान सा था

Wednesday, March 1, 2017

मुरीद

दिल के किसी कोने में यह सुगबुगाहट सी थी

अल्फाजों से अब वो गर्माहट नदारद थी

जिंदगी कभी जिसकी मुरीद हुआ करती थी

धड़कने भी वो अब बेईमानी सी थी

वो शौखियाँ वो चंचलता

लफ्जों से जैसे अब महरूम सी थी

मानो रूठी साँसे कुछ इस तरह ख़फ़ा सी थी

रूह अपनी भी जैसे अब परायी सी थी

चित भी नितांत अकेला सा था

क्योंकि

इस एकांत की ख़ामोशी तोड़ने वाली

धड़कनों का शोर भी अब जैसे मौन था

अल्फ़ाज अब उन लबों से जैसे कोशो दूर थे

अक्सर जिनपे लफ़्ज

इन धड़कनों के ही सजा करते थे

इन धड़कनों के ही सजा करते थे

Wednesday, February 8, 2017

शहर की हवा

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी

गली गली चर्चा यह आम हो गयी

बदनामी इसमें फिर कैसी

बस मेरे इश्क़ कि आगाज़ सरेआम हो गयी

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी

नक़ाब तेरा रुख से उड़ा हवा जो अपने साथ ले गयी

नजरें तेरी दिल मेरा अपने साथ ले गयी

गली गली चर्चा यह आम हो गयी

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी

तेरे मोहल्ले की गालियाँ मेरी पनाहगार बन गयी

फ़ासले तेरे मेरे दरमियाँ कही खो गयी

गली गली चर्चा यह आम हो गयी

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी


रूह से सौदा

हमने जीने के उसूल बदल लिए

वो बदलते किसी ओर के लिए

उससे पहले हम बदल लिए

माना नजरिया अलग था अपना

पर अंदाज

उनका भी कम निराला ना था

रंग उनके सुरूर का इतना गहरा था

हर तस्वीर में उनका ही रूप था

जादू उनकी शख्सियत का ऐसा था

सारा ज़माना

बस उस चाँद का ही दीवाना था

चाहत की इस फलक में

मौशिकी का रूह से यह सौदा था

मौशिकी का रूह से यह सौदा था

खुशियों का गुलाब

बिकती खुशियाँ अगर बाज़ार में

झोली भर मैं भी ख़रीद लाता

सुनहरे सपनों  के साथ में

भटकता नहीं फिर पाने इसको

बंजारों सी उन्माद में

मिलती जो ए

मंदिर मस्जिद या शिवालय में

जाता ना कोई

कोठे या मदिरालय के पास में 

समझ ना पाया कोई

कुंजी इसकी छिपी हैं

खुद रूह की बिसात में

अनजाने कशमकश की इस मार से

टूट गया खुशियों का गुलाब

अपने आप से

अपने आप से



Friday, January 20, 2017

उम्र

उम्र ना पूछ ए हबीबी

बचपन संग जीना अभी बाकी हैं

जवानी की दहलीज़ में फ़ासले

दो चार क़दमों के अभी बाकी हैं

जिंदादिली की मिशाल ही

उम्र के हर पड़ाव के लिए काफ़ी हैं

सँवरती हैं खिलखिलाती सी हँसी

यहाँ तभी

राज इसके उम्र पे जब भारी हैं

जी भर जी लेने दे अभी

ए हबीबी

इस उम्र की तारीख़ अभी बाकी हैं

इस उम्र की तारीख़ अभी बाकी हैं

Sunday, January 15, 2017

इश्क़ ए नादाँ

अधरों पे मेरे इबादत बस एक ही सजी हैं

खुदा तू मेरा,  मौसक़ि भी तू ही हैं

कलमा गुनगुना रहा हूँ बस तेरे ही नाम का

आशिक़ी जूनून बन गयी जैसे चाह की तेरी

झुक गया  सजदे में तेरे आके मैं

कुछ और नहीं बंदगी हैं ये मेरे प्यार की  

पढ़ रही जो आयतें बस तेरे ही नाम की

एक तू ही मेरा मुकम्मल जहाँ मेरे वास्ते

तुझसे शुरू तुझ पे ही ख़त्म

रहनुमाई मेरे इश्क़ ए नादाँ की

मेरे इश्क़ ए नादाँ की




लफ्जों की बौछार

लफ़्ज उनके थे लव मेरे थे

रुमानियत भरी वो शाम थी

चाँद जमीं पे उतर आया था जैसे

हर तरफ़ सिर्फ़ चाँदनी की ही सौग़ात थी

बिन कहे उस पल वो सब कह गयी

लवों पे मेरे लफ़्ज अपने छोड़ गयी

लवों से लफ़्ज़ों का मिलन हुआ इस कदर

ना अब मैं था ना कोई दूजी कहानी थी

हर महफ़िल की रौनक

बस मेरे लवों पे सजी

उनके ही लफ्जों की बौछार थी  

उनके ही लफ्जों की बौछार थी

Saturday, January 7, 2017

छोटे से अरमान

छोटे छोटे अरमानों की धूप समेटे

धुंध को चीर बिखर रही

कई नई तेजस ओजस्वी किरणें

सफर के इस शिखर को चूमने

बेताब हो रही जाने कितनी ही किरणें

बाँध रखें थे अब तलक

जिन अरमानों के हाथ

पंख लगा दिए उन्हें

बदलते मौसम की बयार

सजाये अनगिनत अरमानों की बारात

निखर आयी इंद्रधनुषी किरणें

उमड़ते बादलों के दरम्यान

उमड़ते बादलों के दरम्यान