Monday, January 18, 2010

नजराना

जिसने हमको रंज से उठा पलकों पे बैठा रखा है

उनको नजराना मैं क्या पेशे करू

चाँद तारे मिलते नहीं

खुशियाँ बाजार में बिकती नहीं

क्या तोहफा उन्हें भेंट करू

देख ताज मन को ये ख्याल आया

क्यों ना दिल अपना उनके नाम करू

पेशे खिदमत ये छोटी सी जान करू

नजराने में दिल अपना उनको भेंट करू

तोहफा ये वो ठुकरा ना पायेंगे

नजराना हमारा भी कबूल फरमायेंगे

लाजबाब कह के मुस्करायेंगे

गले लगा अपना बनायेंगे

तोहफा हमारा भी कबूल फरमायेंगे

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